आदिवासी हिन्दू नहीं है। (प्रस्तवना)

 प्रस्तावना

अंधश्रद्धा जातिवाद, धर्माधता विषमता और राग द्वेष के गुप्प अंधरे गलियारे से उजाले की और लाने वाले सभी बहुजन महापुरुष को सादर जय सेवा, जय सजोर पेन, जय परसा पेन, जय सगापेन, जय माँ दन्तेश्वरी, जय मूलनिवासी, जय फुले, जय शाहुजी, जय बिरसाजी, जय भिम, जय प्रबुद्ध भारत ।


वे कहते है तुम धर्म की तो बात करो मगर मनुवाद का नाम न लो। भला यह कैसे हो सकता है भगवान बुद्ध ने बुद्ध धम्म की दीक्षा इसलिये दी ताकि समाज मनुवादी ढकसलो, हिन्दु धर्म, रूढीवादी, अंधश्रद्धा पंडा पुरोहितो, साधु संत, नर्क, स्वर्ग, पाप पुण्य के खेलो से बाहर निकले। बाबासाहब ने धम्म की दीक्षा इसलिये ली ताकी उनका समाज ब्राह्मणी व्यवस्था के शिकंजे से बाहर निकलकर अपना स्वतंत्र अस्तित्व आबाद करे। बुद्ध और बाबासाहब ने प्रत्यक्ष मे मनुवाद का विरोध किया फिर उनके अनुयायी मनुवाद के खिलाफ कैसे चुप रह सकते है।


धर्मातरण को लेकर इन दिनो सारे देश ने जबरदस्त शोर मचा हुआ है। झज्जर में मनुवादी शैतानो द्वारा जिंदा काटे जलाए आदिवासी, दलितो के परिवारजनो ने धर्मातरित कर लिया हिंदुत्व का शैतानी चेहरा देखकर बौद्ध बने उन आदिवासी और दलितो को लेकर तरह तरह की चर्चाएँ चल रही है कहा जा रहा है कि हिन्दु धर्म को त्यागना कायरता है। आदीवासीयो को बौद्ध धर्म स्वीकारने से रोका जा रहा है। जबकी महामानव डॉ. बाबासाहब आंबेडकर बहुत पहले ही कह चुके है कि धर्मांतरण पलायनवाद नही हैं। 31 मार्च 1936 को बम्बई में महार (दलित) परिषद में डॉ. बाबासाहबने धर्मातरण पर ऐतिहासिक भाषण दिया था।


आप लोगो में से जिनको हिन्दुओं का गुलाम बनकर रहना हो उनकी जूतियो के तले जीना हो, उनकी दया की भीख पर पलना हो, उन लोगो की इस प्रश्न पर विचार करने की कोई आवश्यकता नही है किंतु जिन्हें स्वाभिमान की जिंदगी प्यारी हो, जिनको मनुष्यता से प्रेम हो। जिन्हें समता, बंधुता, स्वतंत्रता और न्याय का जीवन आवश्यक लगता हो, उनके लिए इस प्रश्न पर विचार किये बिना कोई अन्य रास्ता नही है बुद्ध धम्म इंसानियत की तरफ ले जानेवाला दुनिया का एक ही मार्ग बचा है। हमे यह भुलना नही चाहिए कि डॉ. बाबासाहब आम्बेडकर ने इस देश को भारत का संविधान देकर देश के उद्धार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इस योगदान के लिए उनको पहले आचरणशील व्यक्ति बनना पड़ा था बाबासाहब कि इच्छा के अनुरूप हमें इस देश का शासनकर्ता बनना है तो हमे प्रथम आचरणशील बौद्ध बनना होगा भविष्य में वही आचरणशील बौद्ध इन्सान इस देश को बौद्धमय कर सकेगा आचरणशील बौद्ध बनने कि हमें प्रतिज्ञा करनी होगी यह प्रतिज्ञा ही इस महामानव को सही श्रद्धाजली होगी। 

कर रहे है कि बिरसा मुण्डा हिन्दू धर्म के वैष्णव मत का अनुयायी था। ध्यान रहे में वही आज मनुवादी लोग आदिवासी आन्दोलन की धार कुन्द करने के लिए यह कुटिल प्रचार शातिर लोग है जो आदिवासियों को आदिवासी कहने से भी डरते है और उन्हें वनवासी की गन्दी गाली देते है। दलितो के लिए हरिजन जैसे गाली, आदिवासियो के लिए वनवासी भी गाली । इंदिरा गांधी ने इस गाली को और भी स्पष्ट कर दिया। उन्होंने कहा गिरीजन इस शास्तो में दोनो ही हरामी, सभ्य भाषा में वर्णसंकर । आदिवासी हो या दलित कभी भी उनके साथ 'समता' का नारा नही लगाता बल्कि 'समरस्ता' शब्द देता है। शब्दो के चक्रव्यूह में अनपढ जनता सदियो से उलझाई गई है। यह सच है कि बिरसा ने बंदगाव में रहे वहा के जमीदार जगमोहन सिंह के मुंशी आनन्द पांडे के पास हिन्दु धर्म व वैष्णव धर्म की अधिक बाते सुनी। यदि इसी घटना को आधार मानकर कोई यह प्रचारित करे की बिरसा हिन्दू धर्म का अनुयायी था और हिन्दुओं की रक्षा के लिए ही उसने इसाईयों की खिलाफत की थी तो इससे बड़ा सफेद झूठ कोई दुसरा नही हो सकता। सच तो यह है आदिवासियो को ऐसी जिल्लत की जिन्दगी तक पहुँचाने वाले हिन्दू ही है। जिन्हें घृणा से वे 'दिक्कू' कहते हैं। इन्ही लोगो ने मुण्डाओ को उनकी जमीनों से बेदखल किया। उन्हें शिक्षा से वंचित रखा। उनकी बहन बेटियो की अस्मत लूटी। उनके पुरखो को बंधुआ बनाकर रखा। अपनी अस्मिता की इतनी बड़ी किमत उन्होंने गैर हिन्दु होने के जुर्म में ही चुकाई। आज के आदिवासी एकलव्य की तरह सीधे नही है। वे इस कुप्रचार को कतई स्वीकार नही करते कि बिरसा हिन्दू धर्म का अनुयायी था। यदि ऐसी बात होती तो बिरसा अपने अनुयायियो सहित वैष्णव धर्म में जाता लेकीन ऐसा नही किया। उन्होंने आदि मुण्डा धर्म की नीव रखी जो मुण्डा हिन्दु धर्म की दलदल में धंसे हुए थे वे भी उस ग़न्दे कीचड से निकल कर बिरसा के धर्म से जुडे । मुण्डाओं का आदिवासी धर्म बौद्ध धम्म है। बौद्ध होने के जुर्म में ही उन्हें समतल इलाको से बीहड वनों में हिन्दुओं ने खदेड़ा था। मुण्डाओं के रीती रिवाजो में बौद्ध धर्म खोजा जा सकता हैं।


आदिवासी संस्कृति और 'जमीन पर स्वामीत्व' इन दो बातो से ही आदिवासी अधिकार प्राप्त होते है। इसलिए आदिवासियों को अपने जमीन एवं संस्कृति (आदिवासी धर्म) की रक्षा करनी चाहिए अन्यथा वे गैर आदिवासी बन जाएंगे। यदि आदिवासी समाज को अपनी मुव्हमेंट कामयाब करना है तो, उसे जल जमीन जंगल के साथ संस्कृति और संविधान जोड़ना होगा और आंबेडकरीझम का इसे आधार देना होगा। आदिवासियों के आन्दोलन को आगे बढ़ाने का कार्य करनेवाले प्रत्येक कार्यकर्ता को समाज में जागृति लाने के काम में यह पुस्तक मददगार साबित होगी ऐसा हमारा यकीन और विश्वास हैं। 

 

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